Saturday, June 25, 2011

माहिया




प्रिय मित्रो गीतों पर आपकी मूल्यवान टिप्पणियों के लिए हृदय से आभार.. इस बार आपसे कुछ "माहिये" सांझा करना चाहता हूँ। ‘माहिया’ तीन पंक्तियों का छोटा सा छंद है जो १२-१०-१२ मात्राओं में रचा जाता है। आपकी टिप्पणियों की हमेशा की तरह प्रतीक्षा रहेगी ...
लक्ष्मीशंकर वाजपेयी


कुछ माहिये

इस दर्द की बस्ती में ..
खो जाऊं कैसे ..
अपनी ही मस्ती में ..



है कैसी डगर जीवन
ठोकर ही ठोकर
बस उलझन ही उलझन



जीवन वो कहानी है
जितना जान सके
उतनी अनजानी है


जीवन इक लोरी है
झूला सपनों का
औ वक़्त की डोरी है


क्या प्यार का जादू है !
सारी दिशाओं में
बस तेरी खुशबू है


वो भी दुःख ढोता है
बारिश के ज़रिये
ईश्वर भी रोता है


जब उम्र ये पूरी है ..
अमृत क्यूँ खोजूं ..
मरना भी ज़रूरी है


बस ये ही तरीका है .
दिल में रंग भरो
वरना सब फीका है

28 comments:

बाबुषा said...

bahut sundar !
Kuchh haiku jaise hain na sir ye maahiye !

achhe lage.

रचना दीक्षित said...

अतिउत्तम हर माहिये में आपने गज़ब के भाव भरे है. बहुत संवेदनशील. शुभकामनायें.

सुभाष नीरव said...

इधर 'माहिये' भी हिंदी कविता का एक ज़रूरी हिस्सा बन गए हैं। 'माहिये' लिखने का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा है। 12-10-12 मात्राओं में केवल तुकबन्दी के तौर पर कुछ भी लिख देना 'माहिया' नहीं है। उसके लिए कोई विचार, कोई अनौखा भाव, कोई अनौखी बात होनी ज़रूरी दीख पड़ती है, कविता के इस रूप के लिए। लक्ष्मीशंकर वाजपेयी के ये माहिये इसी तरफ़ इशारा कर रहे हैं। अब यह माहिया ही लें-

वो भी दु:ख ढोता है
बारिश के ज़रिये
ईश्वर भी रोता है

यह महज 12-10-12 मात्राओं में तुकबन्दी नहीं है, एक सधे हुए बेहतरीन माहिये की पहचान है। इसके पीछे कवि का चिंतन और उसकी गहरी सोच के दर्शन हमें होते हैं।

अन्त में 'बाबुषा' जी का प्रश्न जो उन्होंने वाजपेयी जी से किया है- बाबुषा जी माहिया और हाइकु पंक्तियों के हिसाब से भले ही एक समानता रखता प्रतीत होता हो, लेकिन है नहीं। 'हाइकु' में तीन पंक्तियां 5-7-5 वर्ण के अनुशासन में बंधी है जबकि 'माहिया' में यही तीन पंक्तियां 12-10-12 की मात्राओं में।

इतने सुन्दर माहियों के लिए भाई वाजपेयी जी को बधाई !

arun mishra said...

सारे के सारे माहिए शानदार हैं|तीन पंक्तियों के जादू| बधाई एवं शुभकामनायें|
-अरुण मिश्र.

सुनील गज्जाणी said...

प्रणाम !
बाजपेयी साब !
पढ़े के बाद वो बात ज़हन में बात आती है देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर , वाकई दुष्कर कार्य है सिमित शब्दों में गहरी बात कहना , बधाई , ये विधा भी धीरे धीरे लेखन में अपनी जगह पुनः हासिल कर रही है . बधाई .
साधुवाद
सादर !

रवीन्द्र शर्मा said...

माहिये पढ्ने के बहाने आप को पूरा दोहरा लिया / प्रशंसा के लिए शब्द ना पहले जुटा पाया था , ना आज / निश्शब्द हमेशा की तरह ....!!

ashok andrey said...

priya bhai bajpei jee aapke mahie ke madhyam se aapke nae andaaj ko dekhne ka mouka mila-
jeevan vo kahaani hai
jitnaa jaan sake
utnee anjaani hai,
tatha,
vo bhee dukh dhotaa hai
baarish ke jariye
ishwar bhee rotaa hai.
ati sundar, meri aur se badhai sweekaren.

PRAN SHARMA said...

AAPKE ` MAHIYE ` ( INHEN PANJABI
MEIN TAPPE BHEE KAHTE HAIN )
ACHCHHE LAGE HAIN . KUCHH SAAL
PAHLE MAINE BHEE TEES ,CHAALEES
MAHIYE LIKHE THE . VE NAYA
GYAANODAYA MEIN PRAKASHIT HUE THE .

डा० व्योम said...

बहुत सुन्दर माहिये रचे हैं आपने, वधाई ।

Anonymous said...

ati sunder

Anonymous said...

sare ke sare mahie atyant gahre ...dil ko chu lene wale ya yu kahe rome rome me bas jane wale ...babhai...

mamta kiran

देवमणि पांडेय said...

पहले सूर्यभानु गुप्त ने त्रिपदी लिखी, फिर गुलज़ार की त्रिवेणी दिखाई पड़ी और अब आपके तीन लाइनों के माहिए। अदब की दुनिया में ये सिलसिला सार्थक और शानदार है। इसे आगे बढ़ाइए।
देवमणि पांडेय (मुम्बई)

Devi Nangrani said...

लक्ष्मी शंकर जी
बहुत ही उम्दा गहराई और गीराई लिए हुए अर्थ के साथ आपकी शब्दावली
है कैसी डगर जीवन
ठोकर ही ठोकर
बस उलझन ही उलझन
शुभ्कमानों sahit
देवी नागरानी

Anonymous said...

Like this one.
जीवन इक लोरी है
झूला सपनों का
औ वक़्त की डोरी है

good luck with your poetry recital. Very busy with this evening's award ceremony at House of Lords, where we are honouring Prasoon Joshi and Javed Akhtar. There is a big strike and I am so stressed.

With all good wishes,

Divya Mathur FRSA
www.divyamathur.net

सहज साहित्य said...

आपके प्रत्येक 'माहिया' में छन्द अनुशासन तो है ही ; लेकिन इसके प्राण तत्त्व लय और अबाध प्रवाह भी मौज़ूद है ।

प्रतिभा सक्सेना said...

काव्य-कौशल से पूर्ण आपके माहिये 'हाईकू'जैसे लगे -अंतर सिर्फ़ कलागत है ,पर पैनापन वही !

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee said...

बेहद भावप्रवण व सधे हुए ।
बधाई !

mridula pradhan said...

जीवन इक लोरी है
झूला सपनों का
औ वक़्त की डोरी है
bahut sunder.....

नवगीत-पाठशाला said...

लक्ष्मी शंकर जी, बहुत अच्छे लगे माहिये। पहली बार सुभाष नीरव जी की टिप्पणी के बाद दुबारा पढ़े और असली आनंद पाया बहुत बहुत बधाई...

MANI KA HASHIYA said...

बहुत सुन्दर, भावपूर्ण...बधाई...।

manukavya said...

ब्लॉग जगत के मध्यम से इतनी सारी विधाओं के बारे में सीखने को मिल रहा है.धन्यवाद. हाइकू, हैगा, चोका, और अब माहिये.... सुभाष नीरव जी की टिप्पणी के माध्यम से माहिये के बारे में विस्तृत जानकारी मिली, धन्यवाद. यूँ तो सभी माहिये बहुत अच्छे हैं लेकिन..

जीवन वो कहानी है
जितना जान सके
उतनी अनजानी है
जीवन दर्शन को दर्शाता या माहिया बहुत अच्छा लगा.
और "अमृत क्यूँ खोजूं ../ मरना भी ज़रूरी है "
ये माहिया तो बस लाजवाब है.. सचमुच एक सार्थक सन्देश ....


सादर

मंजु

डा० व्योम said...

बहुत सुन्दर माहिया हैं, माहिया लोक छन्द है और लोक छन्द में लय और प्रवाह का बहुत महत्व है, वाजपेयी जी के माहिया आदर्श माहिया कहे जा सकते हैं, लयात्मकता और प्रवावाहात्मकता के साथ कविता यहाँ देखते ही बनती है, वधाई ।

शशिकांत गीते said...

किसी भी काव्य-विधा के व्याकरण को समझा जा सकता है. छंद को अभ्यास से सीखा या सिद्ध किया जा सकता है.मगर उसकी आत्मा को उसी गहराई और वातावरण में ही छुआ या पकडा़ जा सकता है. लोक काव्य विधा में तो यह बेहद चुनौतीपूर्ण है. बाजपेयी जी के ये माहिया, माहिया के मूल उत्स से आए हैं. बहुत सुंदर माहिया के लिये बहुत-बहुत बधाई, बाजपेयी जी.

Anonymous said...

बहुत ही उम्दा!
Dr Saraswati Mathur

Anonymous said...

बहुत ही उम्दा!
Dr Saraswati Mathur

धर्मेन्द्र कुमार सिंह said...

बहुत अच्छे माहिया रचे हैं आपने, बधाई स्वीकारें

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 17/07/2012 को आपकी यह पोस्ट (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Swati Vallabha Raj said...

ek se badhkar ek....